जीवन की प्रमुख प्रेरक शक्ति

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जीवन की प्रमुख प्रेरक शक्ति

  • 2020-05-02
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जीवन की प्रमुख प्रेरक शक्ति
डॉ. लेन वेगर
अंतर्राष्ट्रीय निदेशक – महर्षि कॉर्पोरेट डेवलपमेंट प्रोग्राम

महर्षि महेश योगी का मानव जाति के लिए अद्वितीय और स्थायी योगदान उनकी गहरी समझ के कारण था और यह थीं––अनुभव प्राप्त करने की पद्धति––शुद्ध चेतना, चेतना की निर्वात स्थिति, चेतना की सबसे शक्तिशाली स्थिति।

भौतिकी हमें आधारभूत स्थिति या निर्वात स्थिति बताती है, यह रचनात्मकता का अक्षय क्षेत्र है– ऊर्जा, सुव्यवस्था और बुद्धिमत्ता: वस्तुतः सभी संभावनाओं का क्षेत्र है। ब्रह्मांड में सब कुछ-चेतन और निर्जीव-इस क्वांटम यांत्रिक स्तर से निकलता है। वैदिक विज्ञान इसे प्राकृतिक नियमों के पूर्ण सामर्थ्य के रूप में संदर्भित करता है। प्रकृति के सभी असंख्य नियम- प्रकृति की बुद्धिमत्ता के आवेग-ब्रह्मांड में सभी विविध प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने के लिए उत्तरदायी हैं, यहाँ पाए जाते हैं। प्रकृति की असीमित क्षमता की योग्यता विचार के स्रोत पर प्रत्येक व्यक्ति के भीतर स्थित हो सकती है, जो किसी की जागरूकता की सबसे अधिक व्यवस्थित स्थिति है। शुद्ध चेतना के इस स्तर से कार्य करने से, प्रकृति के नियमों की असीम क्रियाशक्ति मिलती है, जिससे सब कुछ प्राप्त करना आसान हो जाता है।

समुद्र पर एक लहर की कल्पना कीजिये। यहां तक कि एक बहुत बड़ी लहर की भी सीमाएं, हैं; यह केवल इतनी ऊँची और इतनी चौड़ी हो सकती है। अब कल्पना कीजिए कि जब तक वह समुद्र के साथ विलीन नहीं हो जाती, तब तक लहर का अस्तित्व है। जब लहर बैठ जाती है, लहर का सीमित मूल्य तब समुद्र की असीमित, असीम रूप से अधिक शक्तिशाली स्थिति को मानता है। लहर, जो पहले बँधी हुई थी, अब अबाधता प्राप्त कर लेती है।

हमारा मन भी लहरों की तरह ही बैठ जाने या भावातीत हो जाने की प्रक्रिया में सक्षम है। महर्षि के भावातीत ध्यान (टीएम) के दौरान, विचार की तरंगें विचार के स्रोत तक पहुँच जाती हैं। शब्द "भावातीत " का अर्थ है पार जाना; "ध्यान" सोच को संदर्भित करता है। भावातीत ध्यान के दौरान मन के विचार सूक्ष्म और अधिक सूक्ष्म होते जाते हैं और तब तक सूक्ष्म होते जाते हैं जब तक कि व्यक्ति पूरी तरह विचारों के स्रोत तक नहीं पहुँच जाता। उत्तेजित, सीमित विचार शांत और असीमित स्थिति को प्राप्त करता है, जो कि चेतना सागर की अनंत गहराई है। भाव के पार-भावातीत स्थिति में विचार उतना ही प्रयासरहित होता है जितना एक व्यक्ति के लिए साधारण रूप से सोचना। अगर कोई आदमी दौड़ सकता है, तो स्वाभाविक रूप से वह चल भी सकता है और स्थिर भी रह सकता है। सक्रिय मन में पहले से ही चुपचाप जाग्रत रहने की क्षमता होती है, किसी प्रयास की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए केवल एक तकनीक की आवश्यकता है।

मन पानी के एक तालाब की तरह है: सतह पर चंचल, इसकी गहराई पर मौन और स्थिर। जब हम केवल सतह के स्तर पर शोर का अनुभव करते हैं, तो कठिनाइयाँ प्रचुर मात्रा में होती हैं। सभी समस्याएं, मन की उत्तेजित स्थिति के परिणामस्वरूप होती हैं । यदि हम सतही मनःस्थिति को उसकी निर्वात अवस्था में ले जा सकते हैं - अगर हम चेतना की गहराई पर निहित स्थिरता को प्रभावी कर सकते हैं - तो हम "परिवर्तन के प्रवाह" से अछूते रहेंग

भगवद गीता (अध्याय 2.48) में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: 'योगस्थ कुरु कर्मणि': योग (शुद्ध चेतना), में स्थित होकर कर्म करते हैं। यहां मन सबसे शक्तिशाली, सबसे प्रभावी होता है। 'योग: कर्मसु कौशलम्' (अध्याय 2.50): योग में क्रिया की कुशलता है। इस स्तर से, हम "कार्य कम करते हैं और परिणाम अधिक पाते हैं"। आंतरिक मौन का विकास आध्यात्मिक उन्नति और भौतिक सफलता का आधार है: यही 200% जीवन है ।

निष्कर्ष: चेतना जीवन की प्रमुख प्रेरक शक्ति है। हम जो कुछ भी करते हैं वह हमारी चेतना की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। यदि आपका मन नींद में है, उत्तेजित है, या नकारात्मक है, तो आप जो कुछ भी अनुभव करते हैं/बोलते हैं/ करते हैं, वह उस असंयम को दर्शाता है। लेकिन अगर किसी की चेतना व्यवस्थित, जाग्रत और सतर्क है, तो दुनिया बहुत अलग दिखाई देती है। चेतना की विभिन्न अवस्थाओं में ज्ञान का स्तर भी भिन्न होता है। जब कोई लाल चश्मा पहनता है, तो सब कुछ लाल दिखाई देता है। यदि हरे रंग के का चश्मा पहनें तो सब कुछ हरा दिखाई देता है। ऋग्वेद कहता है: "ज्ञान चेतना में निहित है"। विश्व वैसा ही है, जैसे हम स्वयं हैं। यदि आप चेतना की मौन, आनंदपूर्ण स्थिति में स्थिर रहते हैं, तो आप जो कुछ भी करते हैं वह आनंद की लहर बन जाता है। महर्षि जी ने कहा है, "उस एक चीज को––चेतना को सम्हालें, जिसके सम्हालने से बाकी सब कुछ संभाला जा सकता है।"

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